Friday, December 18, 2009
लो क सं घ र्ष !: हमारे देशभक्त
हमारे ये नौकरशाह देश को राष्ट्रभक्त, देशभक्ति, नैतिकता, कानून, न्याय, लोकतंत्र का पाठ विभिन्न समारोहों में मुख्य अतिथि या अतिथि बनकर पढ़ाते रहते हैं और उनके अनुकरणीय आचरण को देख कर जनता भी इन्ही चीजों का अनुसरण करती रहती है। अब सवाल यह उठता है कि देशद्रोही, गद्दारी बेचारा क्या करे ?
ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने दुनिया की जनता को गुलाम बनाने के लिए गुलाम देशों में प्रशासनिक सेवाओं का तंत्र निर्मित किया था और आज भी नौकरशाहों का न चरित्र ही बदला है न ही साम्राज्यवादी सोच इस कारण इन लोगों से भारतीय जन गण का भला नहीं होने वाला है ।
सुमन
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Thursday, December 17, 2009
लो क सं घ र्ष !: आधुनिक राजा - महाराजा
सुमन
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Wednesday, December 16, 2009
लो क सं घ र्ष !: मुंबई आतंकी घटना का सच
अमेरिकन साम्राज्यवाद की पुरानी इच्छा है कि भारत की संप्रभुता नष्ट करके इसकी हालत आज के पकिस्तान से बदतर बना दी जाए और अप्रत्यक्ष रूप से ब्रिटिश साम्राज्यवाद के तरीके से इस पर राज्य किया जाए।
हमारे देश में ब्रिटिश साम्राज्यवादियों की चापलूसी करने वाले लोगों की एक बड़ी परंपरा आज भी मौजूद है । वह परम्परावादी लोग आज अमेरिकन साम्राज्यवाद की गुलामी करने के लिए प्रयासरत है...आगे पढ़ें!
Tuesday, December 15, 2009
लो क सं घ र्ष !: गंगा ही नहीं हमारा जीवन ही प्रदूषित कर दिया गया है
ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने अँधाधुंध तरीके से जंगलो की कटाई कर जमुरिया नदी को उथली कर दिया था । वन विभाग ने कागज पर इतने पेड़ लगा दिए हैं की जनपद में कोई भी जगह पेड़ लगने से अछूती नहीं रह गयी है । जमुरिया में मछली से लेकर विभिन्न जीव जंतुओं का विनाश भी मुनाफे के चक्कर में हुआ है । जहर डाल कर पानी को विषाक्त कर मछलियां मारी गयी जिससे पानी कि सफाई का कार्य भी स्वत: बंद हो गया ।
गंगा गौमुख से निकल कर बंगाल कि खाड़ी तक जाती है जिसमें हजारों नदियाँ , उपनदियाँ मिलती हैं । जमुरिया नदी के साथ जो कार्य हुआ वही गंगा के साथ हुआ है । जमुरिया नदी भी से गंगा बनती है । जब हमारी मां या बाप या प्राणरक्षक गंगा हो या जमुरिया उसको पहले साम्राज्यवाद ने बर्बाद किया और अब हमारे उद्योगपति, पूंजीपति और नगर नियोजक हमारी नदियों को समाप्त करने पर तुले हैं। यह लोग यह चाहते हैं की पानी के ऊपर उनका सम्पूर्ण अधिपत्य हो जाए और कम से कम 20 रुपये लीटर पानी हम बेचें । आज जरूरत इस बात की है कि इन पूंजीवादी, साम्राज्यवादी शक्तियों व उनके द्वारा उत्पन्न नगर नियोजकों के खिलाफ जन आन्दोलन नहीं चलाया जाता है तो हमारी गंगा बचेगी न हमारी जमुरिया ।
सुमन
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किराये का मकान
उम्र बीत गई किराये के मकान में
आजकल आजकल आजकल आजकल
गुजर बसर हो गई इसी खींचतान में
पिता फिर मां विदा हुईं यहीं से श्मशान में
फिर भी अपना कुछ नहीं किराये के मकान में
बच्चों को मार, डांट, प्यार और पुचकार
रिश्तेदारों की फौज, आवभगत मानसम्मान
न्योते, बधाई, दावत और खूब मचा धमाल
अब भी तनहा रह गए इस मुकाम में
फिर भी अपना कुछ नहीं किराये के मकान में
भाई का लड़ना और बहन का थप्पड़ जड़ना
मां के आंचल में जा रोना और उसका गुस्सा होना
कितनी यादें समेटे ये आंगन इस मकान में
फिर भी अपना कुछ नहीं किराये के मकान में
बच्चे बढ़े, पढ़े और नौकरी पे दूर प्रदेश चले
मैं अकेला ही रह गया किराये के मकान में
और वो भी कहीं आशियाना बना नहीं पा रहे
अपनी जमीन से दूर हैं किसी किराये के मकान में
किराये का मकान अब सताने लगा
अपनी छत का मतलब समझ आने लगा
अपने अपनी ही छत के नीचे मिलते हैं
आदमी अकेला रह जाता है किराये के मकान में।।
-ज्ञानेन्द्र...आगे पढ़ें!
लो क सं घ र्ष !: ‘‘आस्तीन के सांप और दूध पिलाने वाले’’
जो करते हैं राजनीति जाति, धर्म और क्षेत्रवाद की।
पर लागू नहीं होता कोई कानून,
न लगता है NSA, न लगता है मकोका।
आखिर जनता और रियाया है इन्ही के खिलवाड़ की चीज।
क्यूं नही लगवाते रोक, जाति, धर्म और क्षेत्रवाद की राजनीति पर?
न्हीं लगवायेंगे! क्योंकि हमाम में सब हैं नंगे।
क्या राष्ट्रीय! क्या क्षेत्रीय!
इन्होंने ही तो पाला था भस्मासुर पंजाब का,
जिसने मरवाये, बच्चे, बूढ़े, महिलाएं अनेक,
जिनकी तादात हजारों में नहीं लाखों में थी।
यही हाल कश्मीर, आसाम, मणिपुर का अभी भी है।
मरे जा रहे हैं रोज अनेक, कभी गोलियों से, कभी बारूद के धमाकों से,
उड़ते हैं चीथड़े, खून के लोथड़े, इंसानी अंगों के और इंसानियत के भी।
मरते हैं रोज वर्दी वाले या बिना वर्दी के,
हैं तो सब ही भारत मां के सपूत।
फिर ऐसा क्यूं होता है?
वर्दी वाला मरा तो इंसान मरा, बिना वर्दी के मरा तो कुत्ता मरा।
आखिर क्यूं चलवाते हैं,
प्रदर्शनकारी भीड़ पर गोली?
आखिर क्यों करवाते हैं,
फर्जी एन्काउन्टरों में सतत् हत्यायें?
आखिर क्यूं छीनते हैं,
जीवित रहने का नैसर्गिक संवैधानिक अधिकार?
कानून व्यवस्था के बहाने, फर्जी क्राइम रिकार्ड के नाम
सिर्फ और सिर्फ फर्जी आंकड़ेबाजी के लिए,
जनता को ही बेवकूफ बना झूठी वाहवाही के लिए।
जनता का ध्यान मूल मुद्दों से हटाने के लिए,
छोड़ते रहते हैं शिगूफों पर शिगूफे, ताकि आये ही न ध्यान,
रोटी, कपड़ा, मकान, स्वास्थ्य, शिक्षा और महंगाई का।
हमारे ही प्रतिनिधि, मुखिया सरकार के,
चलवाते हैं बाकायदा अभियान,
भरते हैं जेलें गरीब गुरबा जनता से,
फर्जी मुकदमें तो है बपौती, पुलिस और प्रशासन की।
क्या इस अमानवीयता के बिना कानून व्यवस्था रह जाएगी अधूरी।
खड़ा है इस भ्रष्टाचार की नींव पर,
घूस के रूपयों का बहुत बड़ा साम्राज्य।
दबी जा रही है अदालतें ढाई करोड़ मुकदमों के बोझ से,
बेगुनाह साबित होने में लग जाते हैं चार-छः साल।
फिर भी छीना ही जाता रहता है जनता का,
सामान्य जीवन जीने का संवैधानिक अधिकार
होती रहेंगी सतत् हत्यायें मानवता की फर्जी एन्काउन्टरों में।
क्यूं बढ़ावा देते रहते हैं झूठी बहादुरी को?
तमगे और आउट आॅफ टर्न प्रमोशन देकर।
आखिर क्यूं करवाते रहते हैं सतत्,
संविधान की हत्या?
जबकि संविधान से ही पाते हैं,
ताकत और शासन का अधिकार।
फिर क्यूं रख देते हैं संविधान को,
सजाकर सिर्फ अलमारी में?
जहन से निकाल ही क्यूं देते हैं,
संविधान और जनता को?
फिर भी देते फिरते हैं संविधान की दुहाई।
जनता को सिर्फ बेवकूफ बनाने की खातिर।
जबकि खुद ही नहीं करते संविधान का पालन,
करते हैं राजनीति - जाति, धर्म, क्षेत्रवाद और हत्या की।
आखिर ऐसा क्यूं है?
वर्दी वाला मरा तो इंसान मरा, बिना वर्दी के मरा तो कुत्ता मरा।
बागी भी तो हैं इंसान और भारत मां के ही सपूत।
पर उनके मन में है एक आग,
उस आग को ही क्यूं ठंडा नहीं करते?
पानी क्यूं नहीं डालते उस पर?
इंसान क्यूं मारते हैं?
क्यूं बनाते हैं, नीति दमनकारी?
आखिर जानबूझकर क्यूं करते हैं नीतिगत गलती?
वह आग पैदा तो आप ही करते हैं,
आकण्ठ व्याप्त भ्रष्टाचार की विष बेल पर।
आखिर क्यूं पिला रहे हैं दूध आस्तीन के सांपों को?
क्या राज्य की कुर्सी राष्ट्र से ज्यादा जरूरी है?
एक राज्य में कुर्सी न मिले तो क्या कम रह जाता रूतबा राष्ट्र में?
इंदिरा का बलिदान क्या कम है समझने के लिए?
क्यूं नहीं करते स्वच्छ पारदर्शी राजनीति?
क्या तब पेट न भरेगा या रोटी पड़ जाएगी कम?
जिन्ना ने मरवाया था बीस लाख, ठाकरे और राज मरवायेंगे करोड़ों।
जिन्ना ने करवाया था देश के दो टुकड़े, प्रान्त में छिपे जिन्ना करवायेंगे अनेक।
फिर क्यूं नहीं लगवाते रोक, जाति, धर्म और क्षेत्रवाद की राजनीति पर?
नजर बन्द करें इन भस्मासुरों को या डालें काल कोठरियों में।
इन्हें पूरी तरह काट दें समाज और देश दुनिया से।
संेसर काटें इनकी जहरीली वाणी का,
नहीं घुलेगा जहर समाज में नहीं लगेगी आग।
अभियान7 चलाना है तो चलाएं इनके ही खिलाफ,
और शासन तन्त्र में आकण्ठ व्याप्त भ्रष्टाचार के ही खिलाफ।
जो है राष्ट्रद्रोह से भी बढ़कर राष्ट्र के जन-जन के प्रति अपराध,
यही है असली अपराधी समाज के।
ताज में कसाब से निपटाया ब्लैक कैट
बार्डर के दुश्मनों से तो निपट सकते हैं तोप और बुलेट से पर,
आस्तीन के सापों से निपटेंगे कैसे?
माहिर पुलिस रोज करती है फर्जी मुठभेड़ मरते हैं अनेक
क्या है कोई व्यवस्था देश में?
जो इन भस्मासुरों से करे वास्तविक मुठभेड़।
क्यूं बढ़ने और पकने ही दें ऐसे फोड़ों को?
जो बन जाएं नासूर रिसने लगे मवाद और खून।
शुरू में ही क्यूं नहीं नश्तर से देते चीर,
ऐसे गम्भीरतम मामलों में?
कहां खो गयी है विशेषता राष्ट्र की?
कुछ बताएंगे विधि-विशेषज्ञ,
कुछ करेंगे, हमारे विद्वान न्यायाधीश।
इतने बड़े देश में एक अरब की आबादी में।
जूझ रहा है निहत्था सिर्फ एक खिलाड़ी महान।
क्या है कोई ‘‘जांबाज मानुस’’ जो करे मुठभेड़,
अन्त करे इन भस्मासुरों का आस्तीन के सांपों का।।
- महेन्द्र द्विवेदी...आगे पढ़ें!
Monday, December 14, 2009
गीत: एक कोना कहीं घर में, और होना चाहिए... संजीव 'सलिल'
एक कोना कहीं घर में, और होना चाहिए...
*
याद जब आये तुम्हारी, सुरभि-गंधित सुमन-क्यारी.
बने मुझको हौसला दे, क्षुब्ध मन को घोंसला दे.
निराशा में नवाशा की, फसल बोना चाहिए.
एक कोना कहीं घर में, और होना चाहिए...
*
हार का अवसाद हरकर, दे उठा उल्लास भरकर.
बाँह थामे दे सहारा, लगे मंजिल ने पुकारा.
कहे- अवसर सुनहरा, मुझको न खोना चाहिए.
एक कोना कहीं घर में, और होना चाहिए...
*
उषा की लाली में तुमको, चाय की प्याली में तुमको.
देख पाऊँ, लेख पाऊँ, दुपहरी में रेख पाऊँ.
स्वेद की हर बूँद में, टोना सा होना चाहिए.
एक कोना कहीं घर में और होना चाहिए...
*
साँझ के चुप झुटपुटे में, निशा के तम अटपटे में.
पाऊँ यदि एकांत के पल, सुनूँ तेरा हास कलकल.
याद प्रति पल करूँ पर, किंचित न रोना चाहिए.
एक कोना कहीं घर में और होना चाहिए...
*
जहाँ तुमको सुमिर पाऊँ, मौन रह तव गीत गाऊँ.
आरती सुधि की उतारूँ, ह्रदय से तुमको गुहारूँ.
स्वप्न में देखूं तुम्हें वह नींद सोना चाहिए.
एक कोना कहीं घर में और होना चाहिए...
*...आगे पढ़ें!
हार्दिक क्षमा याचना
सहारनपुर वासियों से हार्दिक क्षमा याचना
सहारनपुर : १३ दिसंबर : होटल स्काइलार्क, अंबाला रोड सहारनपुर को सभागार बुकिंग हेतु अग्रिम भुगतान करने के बावजूद अंतिम समय में पूर्व निश्चित सभागार देने से मना कर देने के कारण द सहारनपुर डॉट कॉम का लोकार्पण कार्यक्रम आपात्कालीन ढंग से रामतीर्थ केन्द्र, अंबाला रोड में अंतरित किया गया। कार्यक्रम के आयोजकों द्वारा आपात्कालीन ढंग से फोन और एस.एम.एस. द्वारा सैंकड़ों अभ्यागतों को स्थान परिवर्तन की सूचना दी गई, होटल के बाहर सहायक खड़े किये गये जो आमंत्रितों को स्थान परिवर्तन की जानकारी दे सकें। जनरेटर व जलपान की व्यवस्था के जैसे - तैसे करके वैकल्पिक प्रबंध किये गये। नगर के सैंकड़ों बुद्धिजीवी, पत्रकार, साहित्यकार, कलाकार, उद्यमी एवं व्यापारी जिनको ससम्मान आमंत्रित किया गया था, होटल स्काइलार्क, अंबाला रोड सहारनपुर पहुंचे और वहां कार्यक्रम होता न देख कर किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति में वापिस लौट गये। होटल स्काइलार्क के प्रबंधकों ने वहां पहुंचने वाले अतिथियों को स्थान परिवर्तन की सूचना देने में अपनी ओर से कोई भी सहयोग देने की भी कोशिश नहीं की।
सुशान्त सिंहल ने वैष्णवी नृत्यालय की सम्मानित नृत्य प्रशिक्षिका रंजना नैब, सहारनपुर की गौरव, फाल्गुनी भारद्वाज , और नृत्यांगना श्री से सम्मानित श्रेया सिंहल व अन्य कलाकारों से भी क्षमा याचना की है कि लोकार्पण कार्यक्रम हेतु पन्द्रह दिन से जिन नृत्य प्रस्तुतियों को तैयार करने के लिये ये सहारनपुर के प्रतिष्ठित बाल कलाकार दिन-रात एक किये हुए थे, उन नृत्य प्रस्तुतियों के कार्यक्रम भी कार्यक्रम स्थल में परिवर्तन के कारण रद्द करने पड़े। रंजना नैब, संदीप शर्मा व सुनीत गुप्ता (अभिभावकगण) को प्रस्तुतियों को निरस्त किये जाने से जो मानसिक आघात पहुंचा, उसके लिये द सहारनपुर डॉट कॉम क्षमा-ज्ञापन करता है। उल्लेखनीय है कि स्वामी रामतीर्थ केन्द्र के सभागार में नृत्य कार्यक्रमों की परंपरा नहीं है अतः इस संस्थान की भावनाओं का सम्मान करते हुए फाल्गुनी भारद्वाज और श्रेया सिंहल जैसे बाल - कलाकारों की प्रस्तुतियाँ निरस्त कर दी गई थीं जो सहारनपुर की अंकुरित हो रही प्रतिभाओं का परिचय देने के लिये द सहारनपुर डॉट कॉम द्वारा विशेष अनुरोध करके वैष्णवी नृत्यालय से आमंत्रित की गई थीं।
द सहारनपुर डॉट कॉम के संपादक सुशान्त सिंहल ने पत्रकारों से बात करते हुए जहां एक ओर रामतीर्थ केन्द्र के सम्मान्य संस्थापक आचार्य डा. केदारनाथ प्रभाकर के प्रति उनके इस अभूतपूर्व सहयोग के लिये कृतज्ञता व्यक्त की, वहीं दूसरी ओर सभी ऐसे आमंत्रित महानुभावों से क्षमा - याचना की है जो कार्यक्रम स्थल में अंतिम समय में किये गये इस परिवर्तन की जानकारी न मिल पाने के कारण वापिस लौटने को विवश हुए। उन्होंने इस बात के लिये सहारनपुर के सभी पत्रकार बंधुओं का भी आभार व्यक्त किया कि उन्होंने अपनी ओर से भी कार्यक्रम स्थल में किये गये इस परिवर्तन की सूचना को फैलाने में सहयोग दिया।
द सहारनपुर डॉट कॉम के संपादक सुशान्त सिंहल ने होटल स्काइलार्क की इस लालची प्रवृत्ति की आलोचना की और कहा कि एक बड़ी बुकिंग के लालच में पहले से ही बुक किये गये सभागार को किसी अन्य ग्राहक को दे देना और आयोजकों को इसकी सूचना देने का भी कष्ट न करना अस्वस्थ मानसिकता है और व्यापार की सामान्य आचार-संहिता के खिलाफ है। ऐसा करके यह प्रतिष्ठान सहारनपुर के सभी होटलों के प्रति एक अविश्वास की भावना उत्पन्न कर रहा है, अपनी और सहारनपुर के अन्य होटल व्यवसायियों की छवि को भी धूमिल कर रहा है । अब सभी ग्राहक होटल स्काइलार्क में अपने कार्यक्रमों हेतु बुकिंग कराने से पहले सौ बार सोचेंगे कि कहीं ऐसा न हो, ऐन कार्यक्रम के समय उनको कह दिया जाये कि आपके द्वारा बुक किया गया सभागार तो ज्यादा धन देने वाले किसी बड़े ग्राहक को दे दिया गया है, अब आप चाहो तो इस छोटे से बेसमेंट में अपना कार्यक्रम आयोजित कर लीजिये। द सहारनपुर डॉट कॉम का यह सौभाग्य रहा कि अंतिम क्षणों में भी रामतीर्थ केन्द्र का प्रतिष्ठित एवं सम्मानित सभागार आयोजन हेतु उपलब्ध हो गया और यह कार्यक्रम नगर के सभी पत्रकार बंधुओं के अनन्य सहयोग के कारण पूरी भव्यता के साथ संपन्न हो गया, वरना सहारनपुर के विकास के लक्ष्य को लेकर चल रहे द सहारनपुर डॉट कॉम के लोकार्पण कार्यक्रम में विघ्न डालने का कलंक होटल स्काइलार्क के माथे लगता और कार्यक्रम हेतु पधारने वाले अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के अतिथियों के सम्मुख सहारनपुर की छवि तार-तार हो जाती।
Editor
The Saharanpur Dot Com
M | +91 9837014781
इस विचार को मैने जमा किया है www.wagonrsmartideas.com में
हम सब अपनी कार को करते हैं प्यार ..
कही लग जाये थोड़ी सी खरोंच तो हो जाते हैं उदास ..
मित्रो से , पड़ोसियों से , परिवार जनो से करते हैं कार को लेकर ढ़ेर सी बात ...
केवल लक्जरी नही है , अब जरूरत ... है कार
घर की दीवारो पर हम करवाते हैं मनपसंद रंग , , अब तो वालपेपर या प्रंटेड दीवारो का है फैशन ..
फिर क्यो? कार पर हो वही एक रंग का , रटा पिटा कंपनी का कलर , क्यों न हो हमारी कार युनिक??जिसे देखते ही झलके हमारी अपनी अभिव्यक्ति , विशिष्ट पहचान हो हमारी अपनी कार की ...
कार के भीतर भी ,
कार में बिताते हैं हम जाने कितना समय
रोज फार्म हाउस से शहर की ओर आना जाना , या घंटो सड़को के जाम में फंसे रहना ..
कार में बिताया हुआ समय प्रायः हमारा होता है सिर्फ हमारा
तब उठते हैं मन में विचार , पनपती है कविता
हम क्यों न रखे कार का इंटीरियर मन मुताबिक ,क्यों न उपयोग हो एक एक क्युबिक सेंटीमीटर भीतरी जगह का हमारी मनमर्जी से ..
क्यो कंपनी की एक ही स्टाइल की बेंच नुमा सीटें फिट हो हमारी कार में .. जो प्रायः खाली पड़ी रहे , और हम अकेले बोर होते हुये सिकुड़े से बैठे रहें ड्राइवर के डाइगोनल ..
क्या अच्छा हो कि हमारी कार के भीतर हमारी इच्छा के अनुरूप सोफा हो , राइटिंग टेबल हो , संगीत हो , टीवी हो , कम्प्यूटर हो ,कमर सीधी करने लायक व्यवस्था हो , चाय शाय हो , शेविंग का सामान हो , एक छोटी सी अलमारी हो , वार्डरोब हो कम से कम दो एक टाई , एक दो शर्ट हों ..ड्राइवर और हमारे बीच एक पर्दा हो ..
बहुत कुछ हो सकता है ....
बस जरूरत है एक कंपनी की जो कार बनाने वाली कंपनियो से कार का चैसिस खरीदे और फिर ले आपसे आर्डर , आपकी कार को कस्टमाइज करने का ...
यही तो है मेरा आइडिया , क्या मुझसे सहमत है आप ???
इस विचार को मैने जमा किया है www.wagonrsmartideas.com में
आपसे है गुजारिश कि कृपया http://www.wagonrsmartideas.com/index.php?option=com_comprofiler&task=userProfile&user=1417 पर क्लिक करके मुझे अपना अनमोल मत जरूर दें ....और करे नवाचार का स्वागत ....
आपका
विवेक रंजन श्रीवास्तव...आगे पढ़ें!
Sunday, December 13, 2009
लो क सं घ र्ष !: लड़ो वोट की चोट दो
कुछ ने कहा दाल में काला है, कुछ ने कहा पूरी दाल काली है। सच है जिसने जो भी कहा पर इसका इलाज, शायद लाइलाज है यह मर्ज। अभी चन्द दिनों पहले बात हो रही थी एक अधिकारी से जो मुझसे बोले एक मामले जनहित याचिका करने के लिए, मैंने कहा अगर वो याचिका मैं करता हूं तो वह जनहित याचिका न होकर मेरी स्वहित याचिका बनकर रह जायेगी क्योंकि उसमें लोग मुझे हितबद्ध व्यक्ति समझकर निशाना मुझ पर साधेगें इसलिए मैंने इसके लिए नाम सुझाया सामाजिक हितों को रखकर एक सामाजिक कार्यकर्ता का। जाने-माने कार्यकर्ता हैं वो नाम लेते ही बोले- अच्छा आप संदीप पाण्डे को बता रहे हैं, जो सभी अधिकारियों को भ्रष्ट बताते हैं। भ्रष्टाचार हम करते नहीं बल्कि वह तो हमारी मजबूरी है। हम अपने वेतन में कैसे चला पायेंगे अपनी जिंदगी, गिनाना शुरू किया हर चीज की महंगाई का। मैंने उनको समर्थन देते हुए कहा-हम देश के लगभग सब लोग बेईमान हैं। अपने को बेईमान बताते हुए उन्होंने खुशी से मुझे बेईमान होना मान लिया। मैंने बात फिर आगे बढ़ाई, हां, हम सब बेईमान हैं लेकिन ईमानदार है वह व्यक्ति जिसको बेईमानी का मौका नहीं मिलता। वह बोले आपने तो मेरी बात कह दी, लेकिन मैंने उनकी बात में एक बात और जोड़ी, लेकिन यह तो सिद्धान्त है और हर सिद्धान्त का अपवाद भी होता है अगर कोई ईमानदार है तो अपवाद स्वरूप।
लगता है मैं बहक गया अपनी बात कहते-कहते विषय से हट गया, विषय तो सिर्फ इस वक्त है-लोकतंत्र में वोट की चोट का। हमने तो लोकतंत्र को भी राजशाही में बदल रखा है। राजा का बेटा राजा, उसका बेटा राजकुमार, आगे चलकर राजा। आजकल मीडिया ने एक राजकुमार को बहुत ही बढ़ा रखा है, खबरों में चढ़ा रखा है। कभी खबर आती है-राजकुमार ने दलित के साथ भोजन किया, कभी खबर आयी-राजकुमार ने दलित के घर में रात बितायी। राजकुमार ने दलित के साथ भोजन किया दस रूपये का, दलित के घर तक पहुंचने का खर्च आया, लाख में, दलित के घर तक चलकर सोने में खर्च आया, लाखों का और कुल मिलाकर राजकुमार पर प्रतिदिन खर्च आता है लगभग करोड़ का। फिर छोटे राजकुंवर पीछे क्यों रहें उन्होंने भी सिर उठाया, साम्प्रदायिक उन्माद फैलाया, साम्प्रदायिकता की सीढ़ी पर चढ़कर आकाश छूने का प्रयास किया, वो अलग बात है धराशायी रहे। इस लोकतंत्र ने बहुत सारे छोटे-छोटे राजा पैदा किये हैं जिनके अपने-अपने राज हैं, अपना-अपना ताल्लुका है और अपने दरबारी हैं। गोण्डा के गजेटियर में पढ़ा है कि अली खान के बेटे शेखान खान ने अपने बाप को मारकर उनका सिर मुगल दरबार में पेश किया जो अजमेर गेट पर लटकाया गया और मुगल शासक ने शेखान खान को खुश होकर खान-ए-आजम मसनत अली का खिताब देकर उसे जमींदारी का अधिकार दिया। यही हाल आज के लोकतांत्रिक राजशाही में है-भाई-भाई से लड़ता है, बाप-बेटे से लड़ता है, चाचा-भतीजे से लड़ता है, भतीजा-चाचा से लड़ता है। कोटा और परमिट तक के लिए हम नेताओं की चापलूसी करते हैं, उस चापलूसी में चाहे हमें उनका हथियार ही क्यों न बनना पड़े और हमें हथियार बनाकर लोकतंत्र के ये राजा आगे बढ़ते हैं और वंशवाद फल-फूल रहा है और हम चाटुकारिता करके ही अपने को बहुत बड़ा आदमी मान बैठते हैं। कभी कहते हैं भइया ने मुझे पहचान लिया, नेता जी ने मुझे नाम लेकर बुलाया, देखो कितनी अच्छी याददाश्त है, मंत्री जी ने सभा मेरे नाम का ऐलान किया बहुत मानते हैं मुझे, कहां जाते हैं किसी के घर नेताजी हमारे घर आये थे, सिक्योरिटी के साथ चलते हैं, बहुत बड़े आदमी हैं, देखो सिक्योरिटी छोड़कर और उसे चकमा देकर मेरे घर पहुंच गये, लेकिन यह नहीं सोचा सिक्योरिटी किससे हम जिसके प्रतिनिधि हैं उसके डर से सिक्योरिटी या फिर जिसके प्रतिनिधि हैं उसको डराने के लिए सिक्योरिटी, जितनी बड़ी फोर्स चलेगी जिसके साथ, उतना ही बड़ा स्टेटस माना जाएगा उसका, यह मान्यता दे रखी है हमारे समाज ने।
इन मान्यताओं को समाप्त करना होगा, लोकतंत्र में रहकर लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए लोकतंत्र में भागीदार बनना बहुत जरूरी है, अगर हम हर काम में यही सोचेगें कि लोकतंत्र सिर्फ बड़े लोगों के लिए है, लोकतंत्र में कामयाबी बेईमानों की है, भ्रष्ट लोगों की है, झूठों और धोखेबाजों की है, बेईमानों और दगाबाजांे की है तो हम अपने साथ छल करते रहेगें इसलिए आवश्यक है इन मान्यताओं पर उठाराघात करने की।
आइए, समझिए-समझाइए, मिलिये-मिलाइये लोकतंत्र में वोट की कीमत का सही इस्तेमाल कीजिए और देश की पूंजी पर कुण्डली मारकर बैठे लोगों को शिकस्त देने के लिए, देश की सम्पत्ति को लूटने वालों के लिए एक हो जाइये, मिलकर लड़इये ओर लोकतंत्र के हत्यारों को राजा बनने से देश को बचाने के लिए वोट का चोट दीजिए।
मुहम्मद शुऐब
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Saturday, December 12, 2009
लो क सं घ र्ष !: हम होगें कामयाब एक दिन
दूर पर भैंसों का एक झुंड जो काफी बड़ा था बेबस व लाचार अपने बच्चे को निहार रहा था। किसी की हिम्मत नहीं थी कि वह बच्चे को बचाये। बच्चा शेर का मुह का निवाला बनता इससे पहले एक भैंसा हिम्मत कर बैठा और बच्चे को छुड़ाने के लिए शेरों के झुंड पर टूट पड़ा। अकेले भैंसे आगे बढ़ता देख पहले तो कुछ डरी सहमी भैंसें भी आगे बढ़ीं फिर एक-एक कर सारी भैंसें शेरों के झुंड पर टूट पड़ीं। फिर क्या था, पहल करने वाले भैंसे की हिम्मत बढ़ी और उसने एक-एक कर शेरों को अपनी सींग पर एक-एक करके शेरों को उछालता रहा और शेर दुम दबाकर भागते रहे। हिम्मत न हुई किसी एक शेर की भी कि वह लौटकर भैंसे पर झुंड की किसी भैंस पर या फिर अपने शिकार पर पलटकर हमला करता।
देखा तो बहुतों ने होगा, इस दृश्य को टी0वी0 पर। कोई देखकर हंसता रहा होगा और हंसते हुए अपनी बुद्धि का इस्तेमाल नहीं किया, किसी ने देखा होगा और यह समझा होगा कि यह जंगली जानवरों का खेल है, कोई बुद्धिमान होगा उसने सोचा होगा यही जंगल का कानून है, किसी ने सोचा होगा एकता में बल है। सचमुच एकता में बल है पर उससे आगे एक सोच और विकसित करनी होगी, एकता बनाने के लिए किसी को तो आगे बढ़ना होगा, किसी को तो अपनी जान जोखिम में डालनी होगी और सम्भव है कि अपनी कुर्बानी देनी होगी। जी हां, कुर्बानी! कुर्बानी और वह भी अपनी जान की। अगर आप एकता बनाने के लिए अपनी जान देने को तैयार हैं तो एकता बनेगी और जरूर बनेगी और भैंसों की तरह हम कमजोर ही सही सब कमजोर मिलकर एक बड़ी ताकत बनेंगे और अपने बीच के कमजोर से कमजोर को बचाने में उसी तरह से कामयाब होंगे जिस तरह कमजोर भैंसें कामयाब हुईं, अपने कमजोर बच्चे को बचाने में।
कमजोरों, मज़लूमों, दलित, प्रताड़ित, भूख सताये हुओं, धनलोलुपों के शिकार बने, सरकारी तंत्र में पीछे जाने वाले लोगों जागो, उठो और एक होकर अपने अधिकारों को पाने की लड़ाई लड़ों, विजय तुम्हारी होगी और हम होंगें कामयाब एक दिन।
मुहम्मद शुऐब
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लो क सं घ र्ष !: छुद्र स्वार्थों की राजनीति है प्रदेश विभाजन
सुमन
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Friday, December 11, 2009
नव गीत: अवध तन,/मन राम हो... संजीव 'सलिल'
संजीव 'सलिल'
अवध तन,
मन राम हो...
*
आस्था सीता का
संशय का दशानन.
हरण करता है
न तुम चुपचाप हो.
बावरी मस्जिद
सुनहरा मृग- छलावा.
मिटाना इसको कहो
क्यों पाप हो?
उचित छल को जीत
छल से मौन रहना.
उचित करना काम
पर निष्काम हो.
अवध तन,
मन राम हो...
*
दगा के बदले
दगा ने दगा पाई.
बुराई से निबटती
यूँ ही बुराई.
चाहते हो तुम
मगर संभव न ऐसा-
बुराई के हाथ
पिटती हो बुराई.
जब दिखे अंधेर
तब मत देर करना
ढेर करना अनय
कुछ अंजाम हो.
अवध तन,
मन राम हो...
*
किया तुमने वह
लगा जो उचित तुमको.
ढहाया ढाँचा
मिटाया क्रूर भ्रम को.
आज फिर संकोच क्यों?
निर्द्वंद बोलो-
सफल कोशिश करी
हरने दीर्घ तम को.
सजा या ईनाम का
भय-लोभ क्यों हो?
फ़िक्र क्यों अनुकूल कुछ
या वाम हो?
अवध तन,
मन राम हो...
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लो क सं घ र्ष !: यमराज को भी मिलेगा नोबेल शान्ति पुरस्कार
संयुक्त राष्ट्र संघ साम्राज्यवादियों के हितों की पूर्ति के लिए विश्व संगठन है उसी तरह नोबेल पुरस्कार समिति साम्राज्यवादियों के हितों की रक्षा के लिए लोगों को सम्मानित व पुरस्कृत किया करती है । नोबेल पुरस्कार अधिकांश विवादित होते हैं और साम्राज्यवादी शक्तियां उनका इस्तेमाल अपने हितों के लिए करती रहती हैं ।
इजारेदार ओद्योगिक घरानों द्वारा स्थापित सरकारें उन्ही के हितों के लिए कार्य करती हैं आज दुनिया में भूंख प्यास से लेकर प्रत्येक चीज पर इनका कब्ज़ा हो चुका है । हवा पानी से लेकर सभी प्राकृतिक सोत्रों को भी इन लोगों ने बरबाद कर दिया है। मुनाफा इनका धर्म है, नरसंहार इनका अस्त्र है । सारे नागरिकों को गुलाम बनाना इनका मुख्य उद्देश्य है। अपने उद्देश्य के लिए ये ताकतें सम्पूर्ण मानवता को भी नष्ट कर देंगी। इनका लोकतंत्र, स्वतंत्रता, न्याय, शान्ति में विश्वाश नही है । ये शब्द इनके लिए मानवता को ध्वंश करने के औज़ार हैं ।
सुमन
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थैंक यू आरो! नये अमिताभ के लिये!
मैनेजिंग एडिटर
सात हिंदुस्तानी का सिपाही और जंजीर का एंग्री यंगमैन जवान हो गया है। नये अंदाज और नये रूप में। उसका नया नाम आरो है। उम्र तेरह साल। बस थोड़ी दिक्तत है। वो दिखने मे बूढ़ा लगता है। बड़ा सिर, सिर पर कोई बाल नहीं, नसें बाहर निकलने को बेकरार, मोटा चश्मा, टूटे-फूटे दांत, आवाज फटी-फटी सी। फिर भी कूल। शरारती, हाजिर जवाब और सबका प्यारा। ये अमिताभ है। नया अमिताभ। यानि बिग बी। सिनेमा का महामानव।
हमारी पीढ़ी जब जवान हो रही थी तो उसने दूसरा ही अमिताभ देखा था। वो अमिताभ जो लंबा था। भारी भरकम आवाज। कानों तक लटकते बाल और व्यवस्था की आंख में दनदनाता हुआ घूंसा। सिस्टम से नाराज और सिस्टम से बदला लेने को व्याकुल। उसकी हर अदा पर पागल होती जनता और सुपर हिट होती एक के बाद एक फिल्में। लेकिन एक गड़ब़ड थी। ये अमिताभ हर फिल्म में एक ही था। पहले की कार्बन कॉपी। जंजीर में भी वही, दीवार में भी वही, त्रिशूल में भी वही। कोई बदलाव नहीं। अमर अकबर अंथनी हो या फिर सुहाग, या मि नटवरलाल या फिर सत्ते पे सत्ता, वही अंदाज। ये अमिताभ सिर्फ अमिताभ था। कभी-कभी लगता था कि कहानी भी वही बस मामूली फेरबदल।
ये वो दौर था जब अमिताभ को ही ध्यान में रख कर फिल्में बनायी जा रही थीं। लोग ये कहते थे कि अमिताभ वन-मैन इंडस्ट्री हैं। एक से ग्यारह तक सिर्फ वही। कहीं कोई बदलाव नहीं, स्क्रिप्ट के लेवल पर कही कोई प्रयोग नहीं। समाज भी रटे रटाये ढर्रे पर ही चल रहा था। कहीं कोई बुनियादी बदलाव नहीं। हालांकि 75 से लेकर 90 के इस समयकाल में राजनीतिक आंदोलन तो कई हुए। चाहे वो इमरजेंसी के खिलाफ सड़कों पर उतरा लोगों का गुस्सा हो या फिर पंजाब समस्या हो या फिर बोफोर्स पर वीपी सिंह के बहाने बगावत का जज्बा। ये सिर्फ सत्ता में बदलाव को कोशिशें भर थीं। और सिनेमा भी इसका अपवाद नहीं था। गुस्सा था। इस गुस्से को आवाज भी देने की कोशिश की गयी लेकिन नया सपना दिखाने का प्रयास नहीं किया गया। जबकि पुराने "रोमांसवाद" का तिलिस्म टूट रहा था। ऐसे में लोगों के गुस्से में "नामर्दी" ज्यादा थी। और अमिताभ इस "नामर्द गुस्से" को पर्दे पर साकार करते ही दिखे।
उनकी कोई भी फिल्म ले लीजिये वो बगावत तो जरूर करते थे लेकिन अंत में कहीं कोई हल नहीं दे पाते थे। हद तो तब हो गयी जब उनका नामर्द गुस्सा उस मुकाम पर पहुंच गया जहां वो "कुली" बन गये, अपने को "मर्द" बताने मे जुटे, "शहंशाह" हो गये या फिर "जादूगर" "अजूबा" । ये इस नामर्द गुस्से की हताशा थी कि "विजय" को अब "सुपर-नेचुरल-पावर" का सहारा लेने पर मजबूर होना पड़ा। जो अमिताभ भगवान से दो दो हाथ करने को तैयार रहता था वही अब हारता दिखा और ये समझ गया कि "नार्मल पावर" से कुछ नहीं होगा। बुनियादी बदलाव नहीं होंगे, चीजें अपने ढर्रे पर ही चलेंगी लिहाजा सुपर नेचुरल ही कुछ कर सकता है। कहीं कोई अवतार होगा, वो रात के अंधेरे में आयेगा या फिर जादूगर बन कुछ करेगा यानि इंसान के बस में नहीं। इस वक्त उसे प्रयोग करना था लेकिन न उसने कुछ किया और न ही समाज ने कोई करवट ली या नया सपना बुना।
ऐसे में ये कहा जा सकता है कि अमिताभ भले ही ऊपर से क्रांतिकारी दिखे हों लेकिन हकीकत में वो अंदर से डरे हुये थे। असफल होने का डर, अपनी जमी जमायी पूंजी को खोने का डर, यथास्थितिवादी इमेज के गुलाम जिसको हर आहट कंपा जाती है। ये स्थिति ज्यादा चलनी नहीं थी क्योंकि समाज 90 के दशक के बाद परिवर्तन की मांग करने लगा था। उसका डीएनए बदल रहा था। मंडल, कमंडल और नये आर्थिक सुधारों की बयार बहने लगी थी। अमिताभ का डर आखिर उसे ही खा गया और वो कुछ समय के लिये फिल्मों से आउट हो गये। और जिस दशक में आमिर, सलमान और शाहरुख नयी इबारत लिख रहे थे उस दशक में अमिताभ को कुछ नहीं सूझ रहा था। बीच में फिर कोशिश की। पुराने ही अंदाज में "छोटे मियां, बड़े मिया" और "मेजर साहब" के रूप में लेकिन कुली और मर्द देखने वाले दर्शक को अब क क क किरन कहने वाला "एडवेंचरस" शाहरूख ज्यादा भा रहा था जो इमेज का मोहताज नहीं और सिर्फ हीरो ही बने रहने की जिद नहीं।
अमिताभ को बदलना होगा, बुढ़ाते अमिताभ को इमेज की गुलामी से निकलना होगा ये वो जान गये थे लेकिन कैसे ये बड़ा सवाल था। अब नामर्द गुस्से के लिये जगह नहीं थी। सो इस छटपटाहट में कौन बनेगा करोड़पति की तो लगा कि इमेज से बाहर आते ही कैसे लोगों ने उन्हें हाथों हाथ ले लिया। फिर क्या था यंग एंग्री मैन, विजय गायब हो गया। चेहरे की झुर्रियों की खूबसूरती को अपनी बेटी से कम उम्र की लड़की पर दिल आ गया। तब्बू की जवानी पर अमिताभ का बुढ़ापा फिदा हो गया। वो पिटने वाला पुलिस अफसर बन गया और महज आंखों से "सरकार" की ताकत दिखा दी। "ब्लैक" का सनकी ट्यूटर हो या फिर "भूतनाथ" का खिजखिजा मटमैला बदबूदार भूत उसने वो रोल किये जो 70 और 80 के दशक में कोई सोच नहीं सकता था। उसे अपने नयेपन की तलाश में शिल्पा शेट्टी की जगह बिग बॉस बनने में भी झिझक नहीं है। इमेज की गुलामी ने उसे आजाद कर दिया।
और अब आरो ने तो सारी सीमाएं ही तोड़ दीं। आरो ने वो सबकुछ खत्म कर दिया जिसे अमिताभ कहा जाता था। न वो दमदार आवाज, ने वो कद, न वो तेजाबी आंखें और न कानों पर लटकते बाल। 67 की उमर में 13 साल के लड़के का रोल। बड़ा जिगरा चाहिये इस रोल को करने के लिये। अमिताभ ने जब पूरी तरह से अपने आपको "डी-कंस्ट्रक्ट" किया तब जाके पैदा हुआ आरो। जो अमिताभ नहीं है, जो नये "कूल" समाज में काफी "कूल" है। ये आरो के बचपन में अमिताभ के जवान होने की कहानी है। ठहराव से आगे मैच्योर होने का कथानक है। अब उसे किसी सलीम-जावेद की जरूरत नहीं है वो अब आजाद है, आजाद है जहां से उनके अमर होने की कहानी शुरू होती है जिसका कोई सानी भारतीय सिनेमा इतिहास में शायद ही होगा। स्टारडम के साथ इतना वैरियेशन कहां मिलेगा और यही तो नये समाज का भी फसाना है वो आरो की तरह बेहद कूल है। अपनी कमियों के बावजूद अपने को "ट्रांसेड" करता हुया नया स्वप्न संसार रचता हुया। अमिताभ होते हुए भी अमिताभ को पार करता हुआ। थैंक यू आरो! इस नये अमिताभ के लिये!
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