Wednesday, March 21, 2012

कुछ अनकही बाते ? , व्यंग्य: गीता ने बर्बाद किया भारत को:ओरिसन :

Posted by दिनेश पारीक 10:02 AM, under | No comments

कुछ अनकही बाते ? , व्यंग्य: गीता ने बर्बाद किया भारत को:ओरिसन :: आज सुबह सुबह मैं कुछ खोज रहा था गूगल में की कुछ दिन उपरांत ही माँ दुर्गा के नव रात्रि का आगमन होने वाला है तो कुछ पूजा की विधि अपने देश मे...

Saturday, March 17, 2012

बच्‍चा पार्टी Slideshow Slideshow

Posted by मोहन वशिष्‍ठ 9991428447 12:29 AM, under | No comments

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बच्‍चा पार्टी Slideshow Slideshow

Posted by मोहन वशिष्‍ठ 9991428447 12:26 AM, under | No comments

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Wednesday, March 14, 2012

हॉकी -'हिंदी'' पीती अपमान का गरल !

Posted by शिखा कौशिक 10:01 PM, under | No comments


हॉकी  -'हिंदी'' पीती अपमान का गरल !

 

एक  दिन  हॉकी  मिली   ;
क्षुब्ध   थी  ,उसे रोष  था,
नयन  थे अश्रु  भरे 
मन में बड़ा आक्रोश था .


अपमान की व्यथा-कथा   
संक्षेप  में उसने कही ;
धिक्कार !भारतवासियों   पर 
उसने कही सब अनकही .





पहले तो मुझको बनाया 
देश का सिरमौर  खेल ;
फिर दिया गुमनामियों के
 गर्त में मुझको धकेल .


सोने  से झोली  भरी  
वो मेरा ही दौर था ,
ध्यानचंद से जादूगर थे  
मेरा रुतबा  और था .


कहकर रुकी तो कंधे पर 
मैं हाथ  रख  बोली  
सुनो अब बात  मेरी 
हो न यूँ  दुखी भोली .


अरे क्यों रो रही है अपनी दुर्दशा पर ?  
कर इसे सहन  
मेरी तरह ही  पीती रह 
अपमान का गरल 
मैं ''हिंदी'' हूँ बहन !
मैं'' हिंदी '' हूँ बहन !!


                                    शिखा कौशिक 
                      [हॉकी -हमारा राष्ट्रीय  खेल ]

Sunday, March 11, 2012

ये वंशवाद नहीं है क्या?

Posted by शालिनी कौशिक 8:27 PM, under | 3 comments



ये वंशवाद नहीं है क्या?
           
   उत्तर  प्रदेश में नयी सरकार  का गठन जोरों पर है .सपा ने बहुमत हासिल किया और सबकी जुबान पर एक ही नाम चढ़ गया माननीय मुख्यमंत्री पद के लिए और वह नाम है ''अखिलेश यादव''.जबकि चुनाव के दौरान अखिलेश स्वयं लगातार माननीय नेताजी शब्द का उच्चारण इस पद के लिए करते रहे  जिसमे साफ साफ यही दिखाई दे रहा था कि उनका इशारा कभी अपने पिताजी तो कभी अपनी ओर है  क्योंकि माननीय नेताजी तो कोई भी हो सकते हैं पिता हो या पुत्र और फिर यहाँ तो कहीं भी वंशवाद की छायामात्र   भी नहीं है दोनों ही राजनीतिज्ञ हैं और दोनों ही इस पद के योग्य भी .वे इस बारे में भले  ही कोई बात कहें  कहने के अधिकारी भी हैं और फिर उन्हें भारतीय माता की संतान होने  के कारण भारतीय मीडिया ने बोलने  का हक़ भी दिया है किन्तु कहाँ  है वह मीडिया जो नेहरु-गाँधी परिवार  के बच्चों  के राजनीति में आने पर जोर जोर से ''वंशवाद ''के खिलाफ बोलने लगता है क्या यहाँ उन्हें वंशवाद की झलक नहीं दिखती.  अखिलेश को चुनाव से पूर्व मुख्यमंत्री के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया और चुनावों के बाद पिता के दम पर हासिल जीत को पुत्र को समर्पित कर राजनीति में ''अपनी ढपली अपना राग''शुरू कर दिया गया.पर यहाँ कोई नहीं कहेगा  कि यहाँ कुछ भी ऐसा हुआ है जिसकी आलोचना स्वयं वे ही करते रहे हैं जो आज यही कर रहे हैं.सबको उनमे युवा वर्ग का भविष्य दिख रहा है सही है चढ़ते सूरज को सलाम करने से कोई भी क्यों चूकना चाहेगा.
                  शालिनी कौशिक 
                          [KAUSHAL]

Thursday, March 8, 2012

दो हॉकी को मौका !

Posted by शिखा कौशिक 9:16 PM, under | 2 comments




ना छक्का ना चौका ;
दो हॉकी को मौका ;
सजा लो लबों पर बोल 
कर दे गोल ..........कर दे गोल ! 




shikha   kaushik  

Wednesday, March 7, 2012

जीवन के रंग .....: ऐ मनुष्य

Posted by mark rai 2:55 PM, under | No comments

Sunday, March 4, 2012

कुछ अनकही बाते ? , व्यंग्य: मेरी ब्रिज भूमि की होली

Posted by दिनेश पारीक 10:57 AM, under | No comments

कुछ अनकही बाते ? , व्यंग्य: मेरी ब्रिज भूमि की होली: जय श्री कृष्णा फिर से दो दिन बचे है होली के फिर वही जाना है श्री कृष्ण के दरबार मे मा को फिर फोन पे दीवाली पे आन...

Thursday, March 1, 2012

राजस्थान हाई कोर्ट के बाहर न्याय में देरी को लेकर एक व्यक्ति के जहर खाने की घटना को गम्भीरता से नहीं लिया तो अराजकता के हालात से नहीं बच सकेंगे हम लोग

Posted by पत्रकार-अख्तर खान "अकेला" 8:29 AM, under | 1 comment


राजस्थान हाई कोर्ट के बाहर न्याय के इन्तिज़ार में वर्षों से भटक रहे एक व्यक्ति ने नेराश्य में आकर जहर खाकर अपनी इह लीला समाप्त करने की कोशिश की वेसे तो उसे बचा कर न्याय के मन्दिर के बाहर खुद के साथ यह अन्याय करने के लियें दंड भुगतना पढ़ेगा लेकिन न्याय में देरी के मामले को लेकर ..शीर्ष अदालत के बाहर इस व्यक्ति की इस निराशा ने देश के न्यायालयों में देरी से मिल रहे फ़सलों के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया है ........हमारे संविधान में न्याय पालिका ..कार्यपालिका ..संसद तीन स्तम्भ है सभी लोगों पर कहीं न कहीं भ्रष्टाचार और लेट लतीफी के मामले उजागर होते रहे है .............न्याय के मन्दिर भी इससे अछूते नहीं रहे है जजों के खिलाफ महा अभियोग तक लगाये गये है जबकि खुद सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट ने भ्रष्ट और दागी जजों को नोकरी से निकल कर अपना दामन साफ करने की कोशिश की है ...लेकिन न्याय में देरी और विरोधाभासी न्याय दोनों ऐसे तथ्य है जिन पर न्यायालयों और देश की संसद को विचार करना होगा ..कहते है न्यायालय सुप्रीम है फिर कहते है संसद सुप्रीम है फिर कहते है कार्यपालिका सुप्रीम है व्यवहार में सब जानते है के यह सुप्रिमेसी की जंग ने हमारेदेश में अराजकता फेला दी है ..हमारे देश में एक छोटा सा मुकदमा जिसका फेसला कानून में दिन प्रतिदिन सुनवाई के बाद तुरंत किये जाने का प्रावधान है महीनों नहीं सालों और कई सालों तक चलाया जाता है ..देश की कई अदालतों में तो जज नहीं है हमारे राजस्थान के कोटा में तेरह मजिस्ट्रेटों में से नो मजिस्ट्रेट नहीं है जबकि दो जज ..एक मोटर यान दुर्घटना क्लेम जज ...अनुसूचित मामलात जज और खुद जिला जज कोटा में नहीं है ..बात हंसने की नहीं है यह सच है यहाँ एक तरफ तो कोटा के वकीलों ने पक्षकारों का हित बताकर कोटा में राजस्थान हाईकोर्ट बेंच की मांग को लेकर ऐतिहासिक गिनीज़ रिकोर्ड में दर्ज होने वाली हडताल की है और आज न्याय के मन्दिर में जज नहीं होने से कोटा का वकील शर्मिंदा है ...राजस्थान में वकील कोटे से ऐ डी जे की नियुक्ति कहीं ना कहीं उलझती रही है ...देश में एक तरफ तो सेठी आयोग की रिपोर्ट लागू करने का दबाव रहा है जिसमे प्रत्येक तहसील स्तर पर जजों की नियुक्ति और समय बद्ध न्याय का प्रावधान रख कर सिफारिश की गयी है और दूसरी तरफ सरकार ने न्यायालयों की स्थिति यह कर रखी है के यहाँ जजों के बेठने और बाबुओं के फ़ाइल रखने तक के भवन के लाले पढ़े है कहने को तो विधिक न्यायिक प्राधिकरण ..मेडितियेष्ण सेंटर खोले गये है लेकिन इसका फायदा जनता को खान मिल रहा है कुछ देखने को नहीं मिलता ..देश के और खासकर राजस्थान के वकील ..जज रिटायर्ड जज जरा अपने सिने पर हाथ रख कर देखें क्या वोह यहाँ की जनता को समय बद्ध न्याय देने के लियें वचन बद्ध और कर्तव्यबद्ध है सभी लोग आंकड़ों की भूल भुलय्या में फंस गये है हाईकोर्ट चाहता है के निचली अदालते काम करें निचले अदालतों में जज नहीं है एक अदालत के पास चार चार अदालतों के कम है और फिर आंकड़ों का भ्रमजाल कोटा कितने मामले दायर हुए कितने निस्तारित किया बताओं ..खुद हाईकोर्ट नहीं देखता के वहां कितने मामले कितने वर्षों से लम्बित है और अवकाश के मामले में हाई कोर्ट के अवकाश तो कम नहीं होते लेकिन निचली अदालतों में अलबत्ता दबाव होता है सरकार है के हाईकोर्ट में जजों के खाली पढ़े पद भर्ती ही नहीं .देश में अदालतों में चाहे वोह निचली हों या उपरी सभी में एक अभियान के तहत जजों की नियुक्ति कर न्याय का अभियान चलाना होगा वरना हम वकील के नाते रोज़ देखते है के मजिस्ट्रेट और जज कितने तनाव में कितने काम के बोझ में काम करते है ..एक अदालत में एक तरफ तो कानून का दबाव है मर्यादा है के न्यायी अधिकारी एक वक्त में केवल एक ही काम करेंगे गवाह लेंगे तो गवाह होगी ..बहस होगी तो बहस होगी लेकिन हम देखते है के एक अदालत में एक तरफ बहस होती है और दो तरफ ब्यान होते है कानून और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार यह गलत है लेकिन होता है हम कानून के रक्षक यह सब होता हुआ देखते ही नहीं मजबूरी समझ कर मदद करते है लेकिन जरा जमीर को झकझोरें क्या यह सही बात है अगर नहीं तो क्यूँ हम ऐसा होने देते है ............हाई कोर्ट में कोई जनहित याचिका लगाये तो लम्बे कानून हैं लेकिन अगर खुद अदालत प्रसंज्ञान ले और जनहित याचिका मान ले तो कोई कानून कोई मर्यादा नहीं .....तो दोस्तों राजस्थान हाईकोर्ट के बहर न्याय की तलाश में काफी समय से इन्तिज़ार के बाद नेराश्य में आकर एक व्यक्ति की आत्महत्या के प्रयास की घटना चाहे सामान्य हो लेकिन यह दिल और देश की न्यायिक व्यवस्था में देरी को झकझोरने वाली है यहाँ हमे निचली अदालतों के जजों पर निर्णयों में गुणवत्ता का भी दबाव बनाना होगा यह भी पाबंदी लगाना होगी के अगर उनके फेसले उपर की न्यायालयों गलत मान कर पलते तो उन्हें दंडित भी क्या जाएगा तभी वोह निष्पक्ष और सही फेसले दे सकेंगे वरना सब जानते है के निचे की अदालत सज़ा देती है तो उपर से बरी होते है ..निचे से बरी होते है तो उपर से सज़ा होते है ऐसे में अगर विरोधाभास है तो गलती करने वाले को सजा नहीं मिले तो यह न इंसाफी है एक व्यक्ति महीनों जेल में एक गलत फेसले के कारण रहता है ..या जेल से बचता है तो इसमें तो सावधानी और कठोरता होना ही चाहिए ..देश की सरकार देश की संसद देश के महामहिम राष्ट्रपति जी को इस गंभीर मुद्दे पर चिन्तन मनन कर देश को एक नई दिशा देने के लिए देश में न्यायिक सुधार के लियें कदम उठाने होंगे ..न्यायालयों में जो संसाधनों .स्टाफ और जजों की कमी है उन्हें एक विशेष बजट पारित कर उसे पूरा करना होगा वरना यूँ ही रस्म निभाने और एक दुसरे को निचा दिखने की परम्परा से देश और देशवासियों का भला नहीं होगा .........अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

कूटनीतिक कोशिशें कामयाब

Posted by गिरीश"मुकुल" 1:03 AM, under | 1 comment

भारत-ब्रिगेड: पर आपने आलेख देखा कि नार्वे के कब्जे से बच्चों को छुड़ाने के लिए दादा-दादी का धरना दिया गया . प्रवासी दुनिया की ताज़ा पोस्ट में इस बारे में कूटनीतिक कोशिशों की सफ़लता का ज़िक्र करते हुए एक आलेख प्रकाशित किया है..
नार्वे में भारतीय दंपत्ति से अलग किए गए बच्चों को वापस सौंपने में भारतीय कूटनीति ने रंग दिखाना शुरू कर दिया है. ओस्लो की बाल कल्याण सेवा ने मंगलवार को कहा कि देखरेख में लिए गए दोनों बच्चों को वह उनके चाचा को सौंप देगा.
मामले को शीघ्र निपटाने के लिए नार्वे पहुंचे भारत के विशेष दूत ने वहां के अधिकारियों से बातचीत की है. वहीं, बाल कल्याण सेवा के फैसले पर बच्चों के दादा-दादी ने खुशी का इजहार किया है.
वेबसाइट ‘द लोकल डॉट नो’ के मुताबिक सत्वानगर स्थित बाल कल्याण सेवा की ओर से जारी एक बयान में कहा गया, ‘दोनों भारतीय बच्चों को उनके चाचा को सौंपने का निर्णय लिया गया है ताकि वह बच्चों को वापस भारत ले जा सकें.’
नार्वे के अधिकारियों के इस फैसले पर भारत में बच्चों के दादा-दादी ने खुशी जताई है. बच्चों को उनके परिवार को सौंपने की मांग को लेकर दादा-दादी ने सोमवार से नई दिल्ली में चार दिनों का विरोध-प्रदर्शन शुरू किया है.
इसके पहले दिन में नोर्वे में अपने अभिभावकों से दूर रहने के लिए मजबूर किए गए दो बच्चों के दादा-दादी ने मंगलवार को विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा से मुलाकात की. कृष्णा ने आश्वासन दिया कि दोनों भाई-बहन तीन वर्षीय अभिज्ञान और एक वर्षीया एश्वर्या को किसी भी कीमत पर वापस लाया जाएगा.
नोर्वे के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए बच्चों के दादा मंतोष चक्रबर्ती ने कहा कि वह इस पहल से खुश हैं.
उन्होंने कहा, ‘हम यही चाहते हैं कि बच्चे अपने परिवार में शीघ्र वापस आ जाएं.’
बच्चों के दादा-दादी के साथ मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) की नेता वृंदा करात भी कृष्णा के कार्यालय पहुंची थीं. इससे एक दिन पहले ही उन्होंने इस मुद्दे पर चार दिवसीय धरने की शुरुआत की थी.
दादा मंतोष चक्रवर्ती ने बताया कि विशेष भारतीय दूत, सचिव (पश्चिम) एम.गणपति को मामले को सुलझाने के लिए नार्वे भेजा गया है. वह बुधवार को भारत लौटेंगे.
करात ने कहा कि गणपति की ओस्लो से वापसी के बाद ही पता चल सकेगा कि उनकी बैठक का क्या नतीजा रहा. उन्होंने कहा कि कृष्णा का कहना था कि दूत की नार्वे में बैठक सकारात्मक रही है.
ओस्लो में गणपति ने नार्वे के विदेश मंत्री जोनास गार स्टोर से मुलाकात की और उनसे तीन वर्षीय अभिज्ञान व एक वर्षीया ऐश्वर्या की जल्द वापसी के लिए कहा.
उल्लेखनीय है कि पिछले मई में बाल कल्याण सेवा ने एनआरआई दंपत्ति अनुरूप व सागारिका भट्टाचार्य के दोनों बच्चे को अपनी सुरक्षित देखभाल में ले लिया था. संस्था का कहना था कि बच्चों के अभिभावक उनकी उचित देखभाल नहीं कर पा रहे हैं.
सारांश यहाँ आगे पढ़ें के आगे यहाँ

Wednesday, February 29, 2012

ये है मिशन लन्दन ओलंपिक !

Posted by शिखा कौशिक 10:35 PM, under | No comments


आठ साल बाद मिला है मौका .
लक्ष्य हो बस ओलंपिक पुरुष हॉकी GOLD !
भारतीय पुरुष हॉकी टीम को हार्दिक शुभकामनायें !
[यू ट्यूब  पर मेरे द्वारा रचित व् स्वरबद्ध यह  गीत  भारतीय हॉकी टीम को प्रोत्साहित करने वाली भावनाओं से ही ओतप्रोत है .आप सुने व् सुनाएँ .स्वयं भी गायें .]
ये  है मिशन  लन्दन ओलंपिक 
[फेसबुक पर मैंने यह पेज  बनाया  है आप इसे लाइक कर सकते हैं .]
YE HAI MISSION LONDON OLYMPIC !

                                                                   शिखा कौशिक

मेरी कविताओं का संग्रह: दो जन्म

Posted by दिनेश पारीक 9:37 AM, under | No comments

मेरी कविताओं का संग्रह: दो जन्म: हाँ , आज हुआ है मेरा जन्म , एक शानदार हस्पताल में .... कमरे में टीवी है ... बाथरूम है ...फ़ोन है .... तीन वक्त का खाना आता है ..... जब म...

सारांश यहाँ आगे पढ़ें के आगे यहाँ

Tuesday, February 28, 2012

एक वोट डाल कर मैदान मार ले!

Posted by शिखा कौशिक 11:20 AM, under | 1 comment


आज उत्तर प्रदेश  के  छठे  चरण  में  मतदान जरूर करे  व् सही प्रत्याशी को चुनकर विधानसभा  में भेंजें  . 



वोट डाल ले ...वोट डाल ले ..
अब के इलेक्शन में वोट डाल ले .


सबसे जरूरी ये काम जान ले ;
कर न बहाना ये बात मान ले ;
वोट डाल ले ...वोट डाल ले .


वोटिंग  का  दिन  है  ये छुट्टी  नहीं 
इससे  बड़ी कोई ड्यूटी नहीं ;
चल बूथ  पर  वोटर  कार्ड साथ ले ;
वोट डाल ले .....


दादा चलें संग दादी चले ;
भैया के संग संग भाभी चले 
घर घर से वोटर साथ ले 
वोट डाल ले .......


हमको मिला मत का अधिकार ;
चुन सकते मनचाही सरकार ;
लोकतंत्र का बढ़ हाथ थाम ले .
वोट डाल ले .......


साइकिल से जा या रिक्शा से जा ;
कार से जा या स्कूटर से जा ;
कुछ न मिले  पैदल भाग ले 
वोट डाल ले .......


कैसा हो M .P .....M .L .A ?
तुझको ही करना है ये निर्णय ;
एक वोट डाल कर मैदान मार ले .
वोट डाल ले .....
                                          जय हिंद !
                           शिखा कौशिक 
               [नेता जी क्या कहते हैं ]





कुछ अनकही बाते ? , व्यंग्य: जब इस्लाम मूर्ति पूजा के विरुद्ध है तो मुसलमान काब...

Posted by दिनेश पारीक 10:29 AM, under | No comments

कुछ अनकही बाते ? , व्यंग्य: जब इस्लाम मूर्ति पूजा के विरुद्ध है तो मुसलमान काब...: काबा मतलब किबला होता है जिसका मतलब है- वह दिशा जिधर मुखातिब होकर मुसलमान नमाज़ पढने के लिए खडे होते है, वह काबा की पूजा नही करते. मुसलमान कि...

Thursday, February 23, 2012

नसीहत और तरबियत

Posted by SALEEM AKHTER SIDDIQUI 6:58 PM, under | 2 comments

- सलीम अख्तर सिद्दीकी

एक हाईप्रोफाइल मुसलिम परिवार की शादी शहर के सबसे महंगे रिसॉर्ट में हो रही थी। मैं एक पुराने परिचित के साथ बातचीत में मशगूल था। करीब में ही दो और शख्स, जिन्हें मैं भी अच्छी तरह से जानता था, खड़े होकर बातचीत कर रहे थे। तभी उनके पास एक वेटर पहुंचा, जो ट्रे में कोल्ड ड्रिंक के गिलास लिए हुआ था। दोनों ने एक-एक गिलास उठा लिया। एक ने उल्टे हाथ से गिलास उठाया था। उसने गिलास मुंह की तरफ बढ़ाया ही था कि दूसरे शख्स ने उसे टोकते हुए कहा, ‘यार अब तो आदत बदल लो। उल्टे हाथ से खाना-पीना हमारे हमारे पैगंबर को बहुत नापसंद था’। उसने शर्मिदा होते हुए गिलास सीधे हाथ में पकड़ लिया और बोला, ‘बचपन की आदत है, अब कहां जाने वाली है।’ दूसरे ने तंज के साथ कहा, ‘यह तुम्हारी नहीं, तुम्हारे वालिदेन की गलती है। उन्होंने तरबियत सही नहीं की तुम्हारी।’ उनकी बात सुनते हुए मैंने उस शानदार गॉर्डन में नजरें दौड़ाईं, जहां यह शादी हो रही थी। शादी में कहीं पर भी इसलामिक कल्चर की छाप नहीं थी। लोग खड़े होकर खाना खा रहे थे। महिलाएं डिजाइनदार कपड़ों में गहरा मेकअप किए इठलाती घूम रहीं थीं। एक ओर डीजे पर भौंडे गाने चल रहे थे, जिनकी धुनों पर अजीबो-गरीब कपड़े पहने युवा जबरदस्ती डांस करने की कोशिश कर रहे थे। खास बात यह थी कि उन युवाओं में उस शख्स का छोटा भाई भी था, जो सीधे और उल्टे हाथ के बारे में नसीहत दे रहा था। अब उन दोनों की बातचीत का विषय शहर की पॉलिटिक्स पर हो गया था। मैं भी अपने परिचित के साथ बातों में मशगूल हो गया। थोड़ी देर बाद मेरे कानों में आवाज पड़ी, ‘अब्बू मुझसे यह नहीं खाया जा रहा, क्या करुं इसका? मैं कुछ और खाऊंगा।’ मैंने आवाज की दिशा में देखा। नसीहत देने वाले शख्स का बेटा, जिसकी उम्र दस-बारह साल रही होगी, एक प्लेट में बहुत सारा खाना लिए खड़ा था, जो शायद अब उससे खाया नहीं जा रहा था। नसीहत देने वाले ने बहुत ही सहजता से कहा, ‘कोई बात नहीं बेटा, यह प्लेट सामने वाले डस्टबिन में डाल दो और नई प्लेट लेकर जो खाना हो, वह ले लो।’ पता नहीं क्यों, अब उस शख्स को पैगंबर की याद क्यों नहीं आई?



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