Wednesday, December 31, 2008

स्वागतम नववर्ष का

स्वागतम नूतन साल तुम्हारा है,
झंकृत हृदय हमारा है। स्वागतम........
बीते पल जब तुम आए थे
ऐसा ही स्वागत पाए थे
होंठों से मुस्काए थे और
नज़रों से इतराए थे
तुम्हारा आगम कितना प्यारा है। स्वागतम....
ऐसे ही तुम आओ
अधरों पर हँसी खिलाओ
मन का गीत कोई गुनगुनाओ
नूतन सपना कोई सजाओ
ऐसा न्यारा ख्वाब तुम्हारा है। स्वागतम.....
मन की पीडा को हम भूलें
निर्झर लहरों में ही झूलें
उठ के असमान को छूलें
मरहम बन जायें सब शुलें
कैसा जीवन नृत्य तुम्हारा है॥
स्वागतम नूतन साल तुम्हारा है,
कैसा झंकृत ह्रदय हमारा है।
तुम्हारा आगम कितना प्यारा है,
ऐसा न्यारा ख्वाब तुम्हारा है।

फिट रहने के लिए सेक्स जरुरी- केली ब्रुक

हॉलीवुड एक्‍ट्रेस केली ब्रुक ने सेक्‍स को अपनी खूबसूरती का राज बताया है। ब्रिटिश अखबार द सन को दिए एक इंटरव्यू में केली ने बताया कि नियमित सेक्‍स से उनकी बॉडी टोन्‍ड बनी रहती है और उनकी खूबसूरती भी निखरती है। उन्‍होंने इंटरव्यू में खुलासा किया कि रगबी प्लेअर डैनी कैप्रियानी उनके बॉयफ्रेंड हैं और वो पिछले कुछ वर्षों से उन्‍हीं के साथ रह रही हैं। उन्‍होंने बताया कि अपनी बॉडी को फिट बनाए रखने के लिए उन्‍होंने कभी भी डायटिंग का सहारा नहीं लिया।

मैं मुर्दा बोल रहा हूँ.....

मेरा नाम केशव है। अरे-अरे आप घबराइये मत, मैं मर चुका हूँ। सुना है हमारे देश में मुर्दों की बहुत सुनी जाती है , इसलिए यमराज जी से थोडी सी मोहलत मांग के आपसे मुखातिब हूँ। हाँ मेरा नाम केशव था, मैं उत्तरप्रदेश और बिहार के बॉर्डर बनारस का रहने वाला था। कुछ सालों से रोजी-रोटी के लिए बॉम्बे के वरली इलाके में मेरी खोली थी। जब राज ठाकरे के गुंडों ने भैय्याओं की पिटाई, चटाई समझकर कर रहे थे तो घर से बार-बार फोन आने लगा की नौकरी छोड़ कर चले आओ। गुंडों का अत्याचार बढ़ता ही जा रहा था, घर पर बाबूजी बीमार रहने लगे, मुझे लगा की घर चले जाना चाहिए। लेकिन आप ये मत सोचिये की मैं डर गया था। बस बाबूजी की चिंता सताए जा रही थी, इसलिए विगत २६ नवम्बर को मैं घर के लिए ट्रेन पकड़ने वीटी अरे वोही सीएसटी स्टेशन पर पहुँच गया। रात के करीब ११ बजे मेरी ट्रेन थी। मैंने सोचा की चलो कुछ खा-पि लिया जाए। मैं जैसे ही आगे बढ़ा तो देखा की एक गुंडा हांथों में बन्दूक लिए अंधाधुंध गोलियां बरसता मेरी तरफ़ चला आ रहा था। अचानक मैंने सोचा ये कौन है ? फिर मैं कुछ न सोच पाया , होश आया तो ख़ुद दो मृत हालत में मुन्सिपर्टी की बस में ठुसा हुआ पाया। पचासों लोग मरे जा चुके थे। यमराज आए और हमारी आत्माओं को इकठ्ठा करके चलने लगे। तभी एक आदमी बोला अभी रुकिए मीडिया वाले आते होंगे, कुछ फोटो, फुटेज हो जाए तो चलिए। यमराज मुस्कुराये और बोले बेटा यहाँ कोई मीडिया वाला नही आएगा, क्यौकी तुमसे ज्यादा जरूरतमंद लोग मरे हैं, मीडिया ताज होटल, ओबरी होटल और नरीमन हाउस को कवर कर रही है । तुम जैसे फालतू लोगों के लिए उनके पास टाइम नही है और मेरे पास भी! इसलिए चुपचाप मेरे साथ चलो मैं तुम्हे भरोषा दिलाता हूँ ऊपर तुम्हे पुरा कवरेज मिलेगा, कोई पर्सिअलिटी नही होगी। मै केशव अपनी सब इच्छाओ को भुला चुका हूँ। अब मुझे कोई नही मार सकता क्यूंकि मैं तो ख़ुद मर गया हूँ। एकदिन परेड में यमराज जी ने कहा की देखो दुनिया में बहुत से ऐसे लोग हैं जिन्हें जीने का कोई अधिकार नही है लेकिन उन्हें मरना गैरकानूनी होगा इसलिए वे जिन्दा हैं। यमराज जी बता रहे थे की मुझे मरने वाला जिन्दा है ? मैं चौक गया! फिर उन्होंने कहा की येही जिन्दा राक्षश अब तुम्हारे देश की सरकार का देवता है। येही अब तुम्हारे सरकार को चुनावों में जित दिलाने की कोशिश करेगा। मैंने पूछा वो कैसे ? यमराज जी ने कहा -देखा नही तुमने सब कुछ साफ होने के बाद भी सरकार सिर्फ़ आने वाले चुनावों के बारे में सोच रही है। देखो कैसे कैसे प्रायोजित बयां दिए जा रहे हैं। सब वोट बैंक की राजनीति है बेटा तुम्हारी समझ में नही आएगा। फिर मैंने आखिरी सवाल किया। यमराज जी ये बताइए की हमें मरने वाला कौन था? यमराज जी बोले देखो तुम्हे मरने वाला कोई आदमी नही है और न ही कोई मशीन! तुम्हे मरने वाला एक विचार है , जो की दुसरे देशों से आया है और तुम्हे तो मालूम ही होगा की तुमसब कितने नकलची हो, हर विदेशी चीज की ऐसी नक़ल करते होई जैसे तुम्हारी होई। सबसे बड़ी बात ये है की तुम्हारी सरकार इस विचार को तबतक नही मरने देगी जब तक तुम जैसे लोग जिन्दा रहेंगे। लेकिन यमराज जी मारने का ठेका तो बस आपके पास है? यमराज- बेटा जमाना बदल गया है , यहाँ भी अब साझा सरकार है, कुछ को मैं नियम से मारता हूँ और कुछ फिदयेनो को सहयोगी तैयार करके मारते हैं। देखो मरना तो सबको है! कुछ नियम से , कुछ कायदे से और कुछ वायदे से! लेकिन तुम चिंता मत करो तुम्हारे पिताजी भी कल आ जायेंगे एक बार मिलकर मर जाना। कम से कम मरने के बाद तुम्हे तुम्हारे पिता से मिलवा रहा हूँ , तुम्हारी सरकार तो ऐसा भी नही करती। वो तो मरने के बाद भी गाली देती है, कम से कम मैं तो ऐसा

अनकही

वीणा विज 'उदित'
आईने के सामने अपने आपको निहारती लेखा अपने रूप सौन्दर्य पर स्वंय ही मुग्ध हुए जा रही थी। अपनी कदली स्तम्भ सी सुन्दर अनावृत टाँगें और स्कॉर्फ के बंधन से मुक्त लम्बी केशराशि को देखकर वह स्वयं को किसी सिनेतारिका से कम नहीं समझती थी। उसकी सहेलियाँ भी तो उसे कभी किसी सिनेतारिका तो कभी किसी सिनेतारिका के नाम से बुलाती थीं। परिस्थितियाँ और परिवेश किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व को प्रभावित करते हैं और उसके अनुरूप ही उसमें स्वभाव व चरित्र को गढ़ने लग जाते हैं। लेखा की चाल ढाल में भी एक ग़रूर छलकने लगा था। छरहरा बदन उस पर से लम्बा कद उसे भीड़ में भी एक पहचान दे जाता था। उसकी अदाओं में लोच व चेहरे पर एक दमकती आभा बिखरी रहती। होंठों की मुस्कान के साथ उसकी आँखें भी मुस्कुरा उठतीं। तभी तो वह एकांत में भी शरमा गई जिससे सारे शरीर का रक्त उसके चेहरे पर चढ़कर सिंदूर बिखेर उठा। स्कूल में प्रतिदिन उसकी प्रशंसा के पुल बाँधे जाते फलस्वरूप खुशी के मारे उसके पाँव ज़मीन पर नहीं पड़ते थे। आज के युग में युवावर्ग की प्ररेणा का स्त्रोत फिल्मी एक्टर्स ही हैं। बाजारवाद उसको बहुत बढ़ावा दे रहा है जिससे इनका आर्कषण बढ़ता ही जा रहा है। युवक युवतियों में यह छूत की बीमारी की तरह फैलता जा रहा है। फिर सिनेतारिकाओं वाले सारे गुणों से सुसज्जित वह इस के प्रभाव से अछूती कैसे रह पाती। दिन रात इन्हीं ख्यालों में गुम रहती कि कैसे वह उस स्वप्नलोक की दुनिया का हिस्सा बन सके। अपने ख्वाब पूरे कर सके।
बाबूजी बहुत कड़क स्वभाव के थे अम्मा उतनी ही नरम व सदा उनसे सहमी रहतीं। वृन्दा दीदी शादी के बाद मायके रहने आई हुई थीं। आयुष बी. काम. कर रहा था लेखा बी. ए. प्रथम वर्ष में थी और छोटा आरूष अभी आठवीं में पढ़ता था। वृन्दा दीदी से लाड़ लड़ाते हुए लेखा ने जब कहा “दीदी सब लड़कियाँ मझे छेड़ती हैं कि तू तो हीरोईन है। घर में बैठी क्यों समय बर्बाद कर रही है। तुझे तो बम्बई में फिल्म इन्डस्ट्री में होना चाहिए। ”तभी दीदी किसी भावी आशंका से सिहर उठी। उम्र के इस नाज़ुक पड़ाव पर बिन परों के ऊॅची उड़ान भरने ओैर फलस्वरूप औंधे मुँह गिर के ज़ख्मी होने के किस्से आम थे। सो कुछ सोचकर वृन्दा ने उसे समझाया कि वह इन बेकार की बातों पर ध्यान न दे। बल्कि पढ़ लिखकर कुछ बनकर माँ बाबूजी का नाम रौशन करे। लेकिन........
लेखा के दिमाग में जो कीड़ा घुस गया तो निकलने का नाम नहीं। उसके दिमाग में एक विचार कौंधा। उसी के अनुरूप उसने प्रगल्भता से एक प्रोग्राम की रूप रेखा मन में बनाई। जिसकी भनक किसी को भी नहीं लग पाई। कार्तिक की ओस भीनी रात्रि के प्रथम पहर में जब अम्मा चौंका समेटने में व्यस्त व घर के बाकि सब लोग सोने का उपक्रम करते बिस्तरों में घुस चुके थे उसने एक बैग में कुछ कपड़े व पैसे रखकर चोरी से पिछले दरवाजे से घर को त्याग एक अन्जानी मंजिल की ओर कदम बढ़ा लिए। उसे ज़रा भी आभास नहीं हुआ कि वह एक पतली तार के पुल पर भागने जा रही है। जिस पर भागने से किसी भी कारण से गिरना ही उसका अन्त है। फिर वो चाहे पुल की तार के टूटने से या कदम बहकने से हो। उसके भीतर एक उद्दाम आवेग.... एक पैशन था। फिल्मों में हीरोईन बनने की लालसा... एक तूफान ला देने वाला मोहक आकर्षण। चोरी से भागने के कारण वह भयभीत थी कि कहीं कोई उसे देख न ले। उसने दीदी की साड़ी पहन ली थी व उसके पल्ले से अपने आप को अच्छी तरह ढाँप लिया था। पहली बार अपनी रगों में.... अपने खून के कतरे कतरे में वह ऐसा उद्दाम आवेग महसूस कर रही थी मानो एक विशाल जलप्रपात राह में आए रोड़ों व चट्टानों को परे धकेलता हुआ समूची शक्ति व तेजी से आगे बढ़ता चला जाता है। तभी तो वह भी अपनी मंज़िल की ओर उसी समग्रता से बढ़ चली थी।
दिन भर काम में सर खपाती अम्मा चाहे जितनी भी थकी होतीं रात को सोने से पूर्व अपने सारे बच्चों को नज़र भर कर देखने के बाद ही बिस्तर पर लेट पातीं। अपनी बगिया को फलते फूलते देख कर वे ईश्वर का धन्यवाद करतीं। उन्हें लेखा कहीं दिखाई नहीं दी। सारा घर देखने के पश्चात् वे ऊपर छत पर देखने गईं लेकिन वहाँ गहन सन्नाटा था। वे किसी अनहोनी के डर से घबरा गईं। उनके हाथ पाँव फूलने लगे। बाबूजी से बात करना अर्थात् घर में हंगामा खड़ा करना। तो फिर.... वे क्या करें। वे दबे पाँव वृन्दा के पास गईं और उसे हिलाकर चुपचाप रसोई की ओर पकड कर ले गईं। वृन्दा भी मॉ के साथ हैरान सी एकदम चुप सी खड़ी हो गई। जब अम्मा ने उसे लेखा के कहीं भी न होने की खबर सुनाई तो उसका माथा एकदम ठनका। अम्मा के पूछने पर कि उसे किस सहेली के घर ढूँढें वृन्दा ने छूटते ही कहा कि अम्मा वह सहेली के घर नहीं... बहुत खतरनाक रास्ते पर निकल गई है। सुनकर अम्मा घबराहट में रोने लग गईं। तभी वृन्दा का दिमाग तेज तेज काम करने लगा। उसने अम्मा से कहा, “अम्मा तुम एकदम शोर न करो। हिम्मत से काम लेना पड़ेगा। अभी लेखा को घर छोड़े अधिक समय नहीं बीता है। तुम बाहर की बैठक से अपने किराएदार शुक्लाजी को बिन आहट किए बुला लाओ। मैं कुछ पैसे लेकर आती हूँ। उनको साथ लेकर मैं स्टेशन पर पता करती हूँ। तुम पीछे से शान्ति पूर्वक प्रार्थना करना कि हम अपने अभियान में सफल हों। हमें देर हो तो घबराना नहीं उसका मतलब समझना कि हम उसे लेकर आ रहे हैं।”
अम्मा को शुक्लाजी पर भरोसा था। उम्र में ४० के करीब शुक्लाजी अम्मा को जिज्जी बुलाते थे। उनका परिवार गाँव में था लेकिन बैंक में नौकरी के कारण वे शहर में रहते थे। अम्मा छोटे भाई सदृश्य उनका ख्याल रखती थी। शुक्लाजी सीधे सादे व शान्त प्रकृति के थे। उनपर भरोसा किया जा सकता था तभी इस विपदा की घड़ी में उन्हें चुपचाप बुलाकर अम्मा ने सब कुछ समझाकर वृन्दा के साथ कर दिया। दोनो सीधे रेल्वे स्टेशन गए। टिकट खिडकी पर जो बाबू बैठे थे वृन्दा ने छूटते ही उनसे पूछा कि फलां फलां डील डौल की अकेली लड़की ने आधा घंटा पहले कोई टिकट खरीदी थी क्या। उनके प्रश्न पर बाबू ने बताया कि एक जवान सुन्दर सी लड़की ने दस बजे की गाड़ी की बम्बई की एक टिकट ली थी। वृन्दा ने घड़ी देखी अभी साढ़े दस ही बजे थे। उसने बाबू से पूछा कि पहला स्टॉपेज कब आएगा उस गाड़ी का.. तो वे बोले कि भीतर इन्कवायरी से पूछो। शुक्लाजी स्टेशन मास्टर के पास चले गए। वृन्दा भी साथ हो ली। वे भले आदमी थे। वृन्दा का दिमाग बहुत तेजी से घूम रहा था। उसका मन तो पहले से ही भरा था। स्टेशन मास्टर से बात करते ही वह रो पड़ी। वह बोली, ‘हमारी बहन अभी बम्बई के लिए रवाना हुई है। पीछे से पिताजी को दिल का दौरा पड़ गया है। उसे अभी ही रोकना ज़रूरी है कृपया आप बताएँ क्या करें। ’इस समय वृन्दा यह सोच रही थी कि यदि लेखा को हम पकड नहीं पाए तो बम्बई शहर में पहचने पर उस अकेली लड़की का जो बुरा हाल होगा... उसकी कल्पना मात्र से उसके रोएँ सिहर उठे। और घर में बाबूजी का तो हार्ट फेल होना निश्चित ही है। जवान लड़की के घर से भागने पर जो बदनामी होगी उसके कारण समाज में मह दिखलाने के लायक भी नहीं रहेंगे। वह भी अपने ससुराल में कैसे सबका सामना करेगी। यही सब सोच सोचकर उसके आँसू नहीं थम रहे थे।
वृन्दा की हालत व उसकी बात सुनकर स्टेशन मास्टर ने स्नेह से कहा, “बिटिया आप धीरज रखो। अभी आपकी बहन को रोक लिया जाएगा। आप नाम बता दो। हम चलती गाड़ी में हर डिब्बे में अनाउन्समेंट करवा देंगें कि इस नाम की लड़की को पहले स्टॉपेज पर ही उतार लिया जाए उनके पिता सीरियस हैं। आप चिन्ता न करो। साढ़े ग्यारह बजे एक पैसेंजर गाड़ी उधर ही जा रही है आप दोनों एक बजे तक वहाँ पहुँच जाओगे। फिर चाहे तो टैक्सी से या किसी और गाड़ी से वापिस आ जाना।” वृन्दा व शुक्लाजी को लगा कि उनकी हर मुश्किल का हल हो गया। भावावेश में वृन्दा ने स्टेशन मास्टर के दोनो हाथों को पकड़कर भीगे नयनों से उनका धन्यवाद किया व लेखा का नाम उन्हें बताया। तभी स्टेशन मास्टर ने अगले स्टेशन के स्टेशन मास्टर से स्म्पर्क स्थापित किया और तत्काल चलती गाड़ी में घोषणा करवा दी। पूरे ग्यारह बजे गाड़ी के वहाँ पहुँचते ही लेखा को वहाँ उतार लिया गया। उसे वहाँ के स्टेशन मास्टर ने अपने ‘ऑफिस’ में ही बैठा लिया। यहाँ खबर मिलते ही दोनों की जान में जान आई।
आज एक बहुत ही भयानक घटना होने से पहले ही टल गई थी। जिसके अन्जाम सोचकर ही अब वृन्दा की रूह काँप जाती थी। अपनी सूझ बूझ शुक्लाजी का सहयोग और ईश्वरस्वरूप स्टेशन मास्टरजी की मार्गदर्शिता ने उसके परिवार को एक विकट परिस्थिती से बचा लिया था। दोनों ने टिकट लेकर पैसेंजर गाड़ी पकड़ी। मानो कोई विशेष मिशन पर जा रहे हों। समय था कि बीतने को ही नहीं आ रहा था। तभी शुक्लाजी ने कहा, ‘बेटी आपने आज बेटी होने का हक अदा कर दिया है। यदि आप यहाँ न होतीं तो क्या होता मैं तो इसके आगे सोच ही नहीं पाता ह। धन्य हैं जिज्जी जिन्होंने आपको जन्म दिया। आज के युग में ऐसी घटनाएँ सरे आम हो रही हैं। सारा माहौल ही बिगड़ा हुआ है। लेखा भी पश्चाताप कर रही होगी अवश्य ही। ’ वृन्दा चुपचाप हूँ हाँ करती रही। उसे तो यही लग रहा था कि सफर इतना लम्बा कैसे हो गया। मानो सारी उम्र से वो गाड़ी में बैठी है और गाड़ी है कि रुकने का नाम ही नहीं ले रही है। आखीरकार जब गाड़ी आधी रात को प्लेटफार्म पर रुकी तो इक्का दुक्का पैसेंजर वहाँ उतरे जो मजदूर जैसे थे। सामने ही वहाँ के स्टेशन मास्टर इनकी प्रतीक्षा में खड़े थे। उन्होंने मुस्कुराकर इन दोनों का स्वागत किया व अपने ऑफिस में ले गए। वहाँ लेखा सिर झुकाए साड़ी में लिपटी एक कुर्सी पर बैठी थी। दीदी को देखते ही वह रो पड़ी एवम् घबराई सी दीदी की बाँहों में समा गई। ऊपर से नीचे तक उसका सारा बदन काँप रहा था जिसे दीदी ने प्यार से भींच लिया था। उसमें दीदी से नज़रें मिलाने का साहस नहीं था। वृन्दा ने भी उसे ऐसे प्यार किया मानो उसके मृत शरीर में पुनःप्राण संचार होने का करिश्मा हो गया हो। किसी ने भी किसी से कोई बात नहीं की। सबके भीतर का मौन बोल रहा था। और मौन की भाषा सब समझ रहे थे।
पिछले पहर के सन्नाटे में चोरों की भॉति जब यह लोग घर म घुसे तो अम्मा दरवाजे की ओट में सारे देवी देवता मनातीं... अनिष्ट को टालतीं... आँखों से गंगा जमुना बहातीं राह में पलकें बिछाए बैठीं थीं। लेखा को वापिस आई देख उसे अपनी गोद में खींचकर बेतहाशा उसे प्यार करने लगीं। जैसे उनकी खोई हुई अमूल्य निधी वापिस मिल गई हो।
रातरि की गहन कालिमा में लेखा के स्वच्छ निर्मल चेहरे पर जो कालिमा पुतने वाली थी वह अगली प्रातःआकाश मंडल में दिवाकर के उदित होने के पूर्व पौ फटते ही ओस से धुली फूल की पंखुड़ी सी पवित्रता लिए थी। घर की यह सुबह भी हर दिन जैसी ही थी। शूल सी चुभती रात्रि की दास्तां अनकही रह गई थी।
यह कहानी साहित्य कुञ्ज से ली गई है !!!

गरीबी....महसूसना कैसा होता है........????

गरीबी....महसूसना कैसा होता है........????


गरीबी को देखा भी है....और महसूस भी किया है.....मगर इन दोनों बातों और ख़ुद के भोगने में बहुत अन्तर है....इसलिए गरीबी जीना....और महसूस करने में हमेशा एक गहरी खायी बनी ही रहेगी....लाख मर्मान्तक कविता लिख मारें हम....किंतु गरीबी को वस्तुतः कतई महसूस नहीं कर सकते हम...बेशक समंदर की अथाह गहराईयाँ नाप लें हम....!!!क्या है गरीबी.....अन्न के इक-इक दाने को तरसती आँखें...? कि बगैर कपडों के ठण्ड से ठिठुरती देह....??कि शानदार छप्पनभोगों का लुत्फ़ उठाते रईसों को ताकती टुकुर-टुकुर नज़रें....!!!कि इलाज़ के अभाव में इक ज़रा से बुखार से मौत का ग्रास बन जाती अमूल्य जिंदगियां......??कि नमक के साथ खायी जाने वाली रोटी या भात....??कि टूटे हुए छप्परों से बेतरह टपकता पानी....और बेबस-ताकती पथराई-सी आँखें....?? कि भयंकर धुप में कठोरतम भूख से बेजान शरीर से अथक और पीडादायी श्रम करते मामूली-से लाचार इन्सान....??कि जरा-सी गलती-भर से अपमानजनक टिप्पणियों तथा बेवजह मार का शिकार हो जाना.....??कि ज़रा-ज़रा-सी बात पर माँ-बहन की गंदी गालियों की बौछारें...??किकुछ सौ रूपयों में खरीद लेना इक जीवित इंसान का समूचा वक्त और पर्व-त्यौहार में भी अपना घर छोड़कर सेठजी की चाकरी...??कि छुट्टी या पगार बढ़ाने की किसी भी बात पर सेठजी की त्योरी और नौकरी से हटाने की धमकी.....!!कि किसी ऊँचे घर के कुत्ते-बिल्लियों से भी निम्नस्तरीय जीवन.....??कि धरती की गोया सबसे बदतरीन जगहों पर सूअरों की भांति ठुंसे हुए लोग....??कि गन्दा पानी पीते....झूठन खाते.....उतरन पहनते....हर वक्त मालिक की सलामी बजाते...जी-हुजूरी करते बस जिन्दगी काट लेने-भर को जिन्दगी जीते लोग.....!!कि दिन-रात मौत का इंतज़ार करती धरती की आबादी की आधी से ज्यादा आम जनता........यही गरीबी है... इस गरीबी क्या अर्थ है...??इस गरीबी को महसूसना भला कैसा हो सकता है....??इस गरीबी के विषय में लिखने के अलावा क्या किया जा सकता है....पता नहीं कुछ किया जा सके अथवा नहीं....मगर इस पर मर्मान्तक-लोमहर्षक गाथा लिख-कर कोई मैग्सेसे....नोबेल....फलाने या ढिकाने पुरस्कार तो अवश्य ही लिए जा सकते हैं....हैं ना......!!???

अरे भाई...जिंदगी तो वही देगी....जो...........!!

अरे भाई...जिंदगी तो वही देगी....जो...........!!

हम क्या बचा सकते हैं...और क्या मिटा सकते हैं......ये निर्भर सिर्फ़ एक ही बात पर करता है....कि हम आख़िर चाहते क्या हैं....हम सब के सब चाहते हैं....पढ़-लिख कर अपने लिए एक अदद नौकरी या कोई भी काम....जो हमारी जिंदगी की ज़रूरतें पूरी करने के लिए पर्याप्त धन मुहैया करवा सके....जिससे हम अपने परिवार का भरण-पोषण कर सकें...तथा शादी करके एक-दो बच्चे पैदा करके चैन से जीवन-यापन कर सकें...मगर यहाँ भी मैंने कुछ झूठ ही कह दिया है....क्यूंकि अब परिवार का भरण पोषण करना भी हमारी जिम्मेवारी कहाँ रही....माँ-बाप का काम तो अब बच्चों को पाल-पोस कर बड़ा करना और उन्हें काम-धंधे पर लगा कर अपनी राह पकड़ना है....बच्चों से अपने लिए कोई अपेक्षा करना थोडी ना है....वो मरे या जिए बच्चों की बला से.....खैर ये तो विषयांतर हो गया....मुद्दा यह है कि हम जिन्दगी में क्या चुनते हैं...और उसके केन्द्र में क्या है....!!........और उत्तर भी बिल्कुल साफ़ है....कि सिर्फ़-व्-सिर्फ़ अपना परिवार और उसका हित चुनते हैं...इसका मतलब ये भी हुआ कि हम सबकी जिन्दगी में समाज कुछ नहीं....और उसकी उपादेयता शायद शादी-ब्याह तथा कुछेक अन्य अवसरों पर रस्म अदायगी भर पूरी के लिए है....यानि संक्षेप में यह भी कि समाज होते हुए भी हमारे रोजमर्रा के जीवन से लगभग नदारद ही है...और कुछेक अवसरों पर वो हमारी जीवन में अवांछित या वांछित रूप से टपक पड़ता है....समाज की जरूरतें हमारी जरूरते नहीं हैं......और हमारी जरूरते समाज की नहीं....!!........ अब इतने सारे लोग धरती पर जन्म ले ही रहें हैं...और वो भी हमारे आस-पास ही....तो कुछ-ना-कुछ तो बनेगा ही....समाज ना सही....कुछ और सही....और उसका कुछ-ना-कुछ तो होगा ही....ये ना सही....कुछ और सही...तो समाज यथार्थ होते हुए भी दरअसल विलुप्त ही होता है....जिसे अपनी जरुरत से ही हम अपने पास शरीक करते है...और जरुरत ना होने पर दूध में मक्खी की तरह बाहर....तो जाहिर है जब हम सिर्फ़-व्-सिर्फ़ अपने लिए जीते हैं....तो हम किसी को भी रौंद कर बस आगे बढ़ जाना चाहते हैं....इस प्रकार सब ही तो इक दूसरे को रौदने के कार्यक्रम में शरीक हैं...और जब ऐसा ही है....तो ये कैसे हो सकता है भला कि इक और तो हम जिन्दगी में आगे बढ़ने की होड़ में सबको धक्का देकर आगे बढ़ना चाहें और दूसरी ओर ये उम्मीद भी करें कि दूसरा हमारा भला चाहे....!! ऐसी स्थिति में हम......हमारा काम.........और हमारी नौकरी ही हमारा एक-मात्र स्वार्थ...एक-मात्र लक्ष्य....एक-मात्र....एक-मात्र अनिवार्यता हो जाता है....वो हमारी देह की चमड़ी की भांति हो जाता है....जिसे किसी भी कीमत पर खोया नहीं जा सकता....फिर चाहे जमीर जाए...चाहे ईमान...चाहे खुद्दारी..चाहे अपने व्यक्तित्व की सारी निजता.....!!....हाँ इतना अवश्य है कि कहीं...कभी सरेआम हमारी इज्ज़त ना चली जाए.....!!.....मगर ऐसा भी कैसे हो सकता है...कि एक ओर तो हम सबकी इज्ज़त उछालते चलें...दूसरी और ये भी चाहें कि हमारी इज्ज़त ढकी ही रहे....सो देर-अबेर हमारी भी इज्ज़त उतर कर ही रहती है....दरअसल दुनिया के सारे कर्म देने के लेने हैं....और यह सारी जिन्दगी गुजार देने के बाद भी हम नहीं समझ नहीं पाते....ये भी बड़ा अद्भुत ही है ना कि दुनिया का सबसे विवेकशील प्राणी और प्राणी-जगत में अपने-आप सर्वश्रेष्ठ समझने वाला मनुष्य जिन्दगी का ज़रा-सा भी पहाडा नहीं जानता...और जिन्दगी-भर सबके साथ मिलकर जीने के बजाय सबसे लड़ने में ही बिता देता है....और सदा अंत में ये सोचता है....कि हाय ये जिन्दगी तो यूँ ही चली गई...कुछ कर भी ना पाये.....!!........अब यह कुछ करना क्या होता है भाई....??जब हर वक्त अपने पेट की भूख....अपने तन के कपड़े...अपने ऊपर इक छत के जुगाड़ की कामना भर में पागल हो रहे...और पागलों की तरह ही मर गए....तो ये कुछ करना भला क्या हुआ होता.....??.........जिन्दगी क्या है.........और इसका मतलब क्या....सबके साथ मिलकर जीने में अगर जीने का आनंद है....तो ये आप-धापी....ये कम्पीटीशन की भावना....ये आगे बढ़ने की साजिश-पूर्ण कोशिशें....ये कपट...ये धूर्तता...ये बेईमानी...ये छल-कपट....ये लालच...ये धन की अंतहीन....असीम चाहत....इस-सबको तो हर हालत में त्यागना ही होगा ही ना....!!??जीने के खाना यानी भोजन पहली और आखिरी जरुरत है....जरुरत है...और इस जरुरत को पूरा करने के लिए धरती के पास पर्याप्त साधन और जगह....मगर हमारी जरूरतें भी तो सुभान-अल्लाह किस-किस किस्म की हैं आज...??!! फेहरिस्त सुनाऊं क्या......??तो जब हमारी जरूरतों का ये हाल है...तो हमारा हाल भला क्या होगा...............हमारी जरूरतों से उनको प्राप्त करने के साधनों से कई गुना कर दें.... हमारा वास्तविक हाल निकल आयेगा...!! तो ये तो हमारी जिन्दगी है....अरे यही तो हमारा चुनाव है.....हमारी जरूरतों के चुनाव से तय होती है हमारी जिन्दगी....!!हमारे ही बीच से बहुत सारे लोग समाज के लिए जीकर निकल जाते हैं....उन्हें अपना ख्याल तक नहीं आता....और मज़ा यह कि ख़ुद जिंदगी उनका ख्याल रखती है.....और लोग-बाग़ जिनके बीच वो जीते हैं....वो उनका ख़याल रखते हैं.......और तो और हम तमाम अम्बानियों....मित्तलों...और ऐसी ही समाज की अनेकानेक अन्य विभूतियों को जरा सी देर में ही समाज द्वारा बिसार दिया जाता है.....और तमाम फ़कीर किस्म के लोग उसी समाज में हजारों वर्षों तक समाज की इक-इक साँस के साथ आते हैं....जाते हैं....!!!!तय तो हमें भी यही तो करना होता है....कि आख़िर हमें क्या करना है......अरे भाई....हम जो चाहेंगे जिन्दगी हमें वही तो देगी.....!!!???